Friday, August 3, 2012

एक ही विधान है

एक ही विधान है 


देने वाला दाता ही,  ताप है संताप है 
तुझे मिल रहा जो, कर्मो  का ही श्राप है 
मत समझ वे कमजोर, और तू बलवान है 
उनके बल पर ही बना, आज तू धनवान है 

भीड़ देखी हीन भाव से, वह मनुज शैतान है 
छीनकर सारा इनसे, कर रहा अभिमान है
चापलूसी धूर्तता से, हराभरा यह लॉन है
पानी के लिए है जमा, भीड़ को यह भान है 

दिन उनका  भी आएगा, नहीं तुझको ज्ञान है 
सोच आखिर इंसान से, इंसान का ही काम है 

उसके यहाँ न गरीब कोई, न कोई  धनवान है
गरीब और अमिर का, वहां एकही विधान है | 

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर 

Friday, July 6, 2012

औरत की क़ुरबानी

औरत की क़ुरबानी 

औरत वही जो औरों के हित देती अपनी क़ुरबानी 
नारी जीवन शीतल सा पानी और चंदा सी चांदनी ||

औरों के हित रत, खुद का तन तपता रेगिस्तानी 
आदमी का भ्रूण सहर्ष सैहती दे अपनी बच्चेदानी ||

औरत  त्याग की मूरत, ढक घूँघट में अपनी सूरत 
थकी-हारी मशीनरी सी करती सबकी पूरी जरुरत ||

अबला नहीं है औरत मत कुचलों कलियों का अरमान 
अहिल्या औ लक्ष्मी बाई का देख चुके हम बलिदान || 
-
लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला ,जयपुर 

Sunday, March 18, 2012

नन्ही लिखिका अक्षिता रास्ट्रीय बल पुरस्कार से सम्मानित








 





नन्ही लिखिका अक्षिता रास्ट्रीय बल पुरस्कार लेते हुए  





ढेर सारा प्यार,बधाई और शुभ् कामनाए
 


"दि. २४ नव. २०११. इंटरनेट पर हिन्दी की सबसे नन्ही 
लेखिका को भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाल पुरस्कार से 
सम्मानित किया है. संभवतः ये पहला मौक़ा है जब भारत 
सरकार ने किसी प्रतिभा को हिन्दी के चिट्ठे के लिए 
सम्मानित किया है. ये सम्मान प्राप्त करने वाली अक्षिता 
ने अभी पांच बसंत भी पूरे नहीं देखे है. " 
   
पोने पांच साल की उम्र. हिन्दी का एक चिट्ठा... 
और राष्ट्रीय स्तर पर दो बड़े पुरस्कार. ये एक 
नन्ही सी,छोटी सी बिटिया पाखी की ऊंची उड़ान 
की शुरुआत है. हमें उस नन्ही सी अक्षिता पर 
गर्व है | हिंदी साहित्य जगत की इतनी कम उम्र 
की यह धरोहर बन चुकी है | मेरा एवं मेरे पुरे 
परिवार की और से ढेर सारा प्यार एवेम हार्दिक
शुभ कामनाए | साथ ही उसके माता-पिता को भी
बहुत बहुत बधाई,जिन्होंने अछे संस्कार एवं 
परवरिश कर उपलब्धि में महती योगदान दिया है |
जानकारी उपलब्ध करने के लिए हिंदी होम पेज 
को भी धन्यवाद |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर 





Saturday, March 3, 2012


रिश्ता 
महा पुरुषों ने कहाँ है  -
समय लगता है -
जांच परख कर रिश्ते बनाने में 
उम्र गुजर जाती है-
संवेदनशील  रिश्ते निभाने में
मगर नहीं लगते-
दो सेकंड भी रिश्ते टूट जाने में
फिर मुश्किल लगता है-
बिना गाँठ पुनः रिश्ता जुड़ जाने में |
-लक्ष्मण लडीवाला,जयपुर 

Thursday, January 26, 2012

श्रद्धांजली-लाला लाजपत राय को


लाला लाजपत राय को उनकी जयंती २८
-जन. के अवसर पर
          श्रद्धांजली 
जिसके रक्त का कण-कण -
शहीद भगत सिंह की रग-रग में समा गया 
जिसके लहू का कतरा-कतरा-
आजादी की राह दिखा गया 
औ जिसके खौलते खून से -
आखिर ब्रिटिश साम्राज्य भी थर्रा गया 
ऐसे अमर शहीद लाला लाजपत राय को -
नमन शत शत नमन कौटिश:  नमन 
मूल रचना २१-१-१९७२ द्वारा- 
लक्ष्मण लडीवालाजयपुर राजस्थान   

Friday, January 13, 2012

लाला लाजपत राय -श्रद्धांजली


    लाला लाजपत राय को उनकी जयंती २८
-जन. के अवसर पर
          श्रद्धांजली 
जिसके रक्त का कण-कण -
शहीद भगत सिंह की रग-रग में समा गया 
जिसके लहू का कतरा-कतरा-
आजादी की राह दिखा गया 
औ जिसके खौलते खून से -
आखिर ब्रिटिश साम्राज्य भी थर्रा गया 
ऐसे अमर शहीद लाला लाजपत राय को -
नमन शत शत नमन कौटिश:  नमन 
मूल रचना २१-१-१९७२ द्वारा- 
लक्ष्मण लडीवालाजयपुर राजस्थान   

Sunday, January 8, 2012


लघु-कहानी                              प्रतिष्ठा
                                                     -|  लक्ष्मण लडीवाला,जयपुर         

जवाहरात व्यवसायी रामकिशन ने अपनी पढ़ी लिखी लड़की सोनाली के लिए अच्छा वर
 तलाशने हेतु पांच सितारा होटल में उच्च घर्राने के कई लडके देखने के बाद, आखिरकार
 सम्भ्रान्त परिवार के ही डा. राजवंशी के पौत्र एवं योगेश के पुत्र सौरभ के साथ सम्बन्ध
 तय किया |विवाह में शान-ओ-शौकत में काफी खर्चा किया एवं दहेज़ में भी जेवरात एवं
 कार देकर लड़की को बिदा किया |  राजवंशी केतीनो पुत्रो का स्वतन्त्र व्यवसाय था | 
पर सौरभ अपने पिता के साथ न बैठकर अंपने चाचा की होटल में बैठता था |किन्तु
 कुछ समय पश्चात वहां जाना भी पारिवारिक रिश्तो में अपरिहार्य कारणों से बंद हो गया |
     आखिरकार रामकिशन ने अपने दादाम सौरभ को अपने पुत्र दिलीप के जवाहरात
 व्यवसाय में ही सम्मिलित कर लिया | कुछ समय तक सम्मिलित रूप से साझा व्यवसाय
 करते हुए जीजा-साले जवाहरात व्यवसाय के साथ साथ चांदी के वायदा(सट्टा) कारोबार
 में भी उतर गए | वायदा कारोबार में शुरू में अच्छा लाभ देख, काम का विस्तार किया और
 पूजी निवेशित की पर कुछ समय बाद ही काफी नुक्सान में आ गए | अब दूरभाष पर 
ग्राहकों से ऊँची आवाज में बतियाने और देर रात तक घर लौटने के दिलीप की तरह ही 
उसके जीजा सौरभ की भी आदत बन चुकी थी | २ वर्ष पश्चात ही जीजा-साले में बातचित 
तू-तडाके से होने लगी |
    इधर रामकिशन के छोटे भाई बालकिशन की सांवलेरंग, पर शिक्षित लड़की अर्पिता का
 उनसे कम  प्रतिष्ठित पर, शिक्षित नौकरी पेशा परिवार के लड़के कल्पित के साथ स्वेच्छिक 
 (लव-मैरिज)विवाह हो गया | कल्पित और अर्पिता दोनों ही नौकरी कर खुइशी जीवन व्यतीत 
करने लगे | अपने भाई की लड़की अर्पिता को खुश देखकर रामकिशन को अहसास हो गया क़ि
 पैसा खर्च करके ही लड़की के लिए खुशिया नहीं खरीदी जा सकती | अपनी चचेरी बहिन
 अर्पिता कि खुशी और उसके पति कल्पित का ससुराल में मान-सम्मान देखकर सोनाली 
को भी अहसास हो गया क़ि सौरभ काससुराल में साले के व्यसाय में सम्मिलित होना
 एक भूल थी और इससे ससुराल में ही नहीं,रिश्तेदारी और समाज में भी प्रतिष्टा कम हुई है | 
 लेखक - लक्ष्मण लडीवाला
कृष्णा-साकेत १६५,गंगोत्री नगर, टोंक रोड, जयपुर-३०२०१८