उसको कहना
मधुशाला (गीत)
होश गवांता
मनुज जहाँ, उसे न कहना
मधुशाला, |
हरदम छलके जाम जहाँ, गिर पड़ते लेकर प्याला|
तन को जो छलनी करदे, मद में वह विष पान करे,
मद्यपान कर बेसुध हो, मयखाना बदनाम रहे |
इंसाँ से हैवान बने, मधु नहि वह तो है हाला,
मन मुग्ध करदे मनुज को,उसको कहना मधुशाला |
हरदम छलके जाम जहाँ, गिर पड़ते लेकर प्याला|
तन को जो छलनी करदे, मद में वह विष पान करे,
मद्यपान कर बेसुध हो, मयखाना बदनाम रहे |
इंसाँ से हैवान बने, मधु नहि वह तो है हाला,
मन मुग्ध करदे मनुज को,उसको कहना मधुशाला |
जाम सुरों से छलकाएं, हम कानों से पान करे,
रसिक कर्णप्रिय गीत सुने, वाह वाह कह दाद भरे
घर भर के सब साथ चले, हँसते खिलते बात करे,
छोटे-बड़े सब साथ हो, मन क्यों लज्जा ध्यान धरे|
कविता में गर मिठास हो, तृप्ति का यह अमृत प्याला,
मन मुग्ध करदे मनुज को,उसको कहना मधुशाला |
सुर को असुर बनाते जो, इंसाँ को हैवान करे,
करते है विषपान जहाँ, मधुशाला क्यों नाम धरे |
मद्यपान वर्जित करदे, जपता मै ये निज माला,
शब्द पिलादे मधुर भरे, आतुर है मन की ज्वाला |
हँसा हँसा मुदित करदे, वही रस भरी मधुशाला,
मन मुग्ध करदे मनुज को,उसको कहना मधुशाला |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
रसिक कर्णप्रिय गीत सुने, वाह वाह कह दाद भरे
घर भर के सब साथ चले, हँसते खिलते बात करे,
छोटे-बड़े सब साथ हो, मन क्यों लज्जा ध्यान धरे|
कविता में गर मिठास हो, तृप्ति का यह अमृत प्याला,
मन मुग्ध करदे मनुज को,उसको कहना मधुशाला |
सुर को असुर बनाते जो, इंसाँ को हैवान करे,
करते है विषपान जहाँ, मधुशाला क्यों नाम धरे |
मद्यपान वर्जित करदे, जपता मै ये निज माला,
शब्द पिलादे मधुर भरे, आतुर है मन की ज्वाला |
हँसा हँसा मुदित करदे, वही रस भरी मधुशाला,
मन मुग्ध करदे मनुज को,उसको कहना मधुशाला |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला