Thursday, August 29, 2013

चढ़े प्रेम का रंग (दोहे)

चढ़े प्रेम का रंग (दोहा)

प्यार बिना क्या जिन्दगी,जीवन मृतक समान,
सतरंगी  बनकर  रहे,  करे  प्यार का  मान। 
                                                           
चले प्रीत की नर्सरी चुने प्यार का रंग,
भर पिचकारी नयन सेजीत प्रेम का जंग|

मन मेरा फागुन हुआउड़े पवन के संग,         
फागुन बरसाने लगा,  प्रेम प्रीत के रंग ।        
                                                            
मन की कलियाँ खिल उठीफागुन आया देह 
खुशबू  से मन झूमताअखियाँ बरसे नेह ।   
                                                             
साजन ऐसा प्यार दे,  कभी न छूटे रंग,           
सात जनम का साथ है,इक दूजे के संग ।      
                                                             
मन के बादल बरसतेघुले सांस में भंग,      
थिरके पाँव रुके नहीं ,  पूरे अंग मृदंग ।        
                                                            
भर पिचकारी रंग से,  करे प्रेम की  मार,      
तन चंगा मन बावरासहते रस की धार।     
                                                            
महँगाई की मार ने, महँगा किया  गुलाल,      
कर में नेह अबीर ले, साजन के कर लाल|      
                               
होली उत्सव है भलालोक पर्व का अंग 
रंग बिरंगे झूमते,  बजे ढोल ढप चंग । 
                                                              
दस्तक दी होलास्ट नेथिरके सबके अंग 
थिरके पाँव रुके नहींजैसे पी हो भंग । 
                                                              
होली के त्यौहार मेंचढ़े प्रेम का रंग,
भेद भाव को छोड़कर,होली खेले संग । 
                                                     
छंदों में भी दिख रहाहोली का सत्संग,
भंग चढ़ा कर लिख रहे,प्रेम भरे सब छंद ।
                                                           
 -लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला  




उसी राह पर दौड़

मानव दौड़ें राह पर, थकते उसके पाँव
आत्मा नापे दूरियाँ, नगर डगर हर गाँव |

थक जाते है पाँव जब, फूले उसकी साँस,
मन तो अविरल दौड़ता,मन में हो विश्वास |

सार्थक मन की दौड़ है, भौतिकता को छोड़
सही राह को जान ले, उसी राह पर दौड़ |

पञ्च तत्व से तन बना, जिसका होता अंत
बसते मन में प्राण है, जिसकी दौड़ अनंत |
भौतिकता को छोड़ कर, अंतर्मन की मान,
दिल गवाह जो भी करे, उस पर देना ध्यान
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला 
जयपुर दि. २९-५-२०१३ 



सदस्य टीम प्रबंधनComment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 9:28am



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इन सार्थक और सोद्येश्य दोहों के लिए हृदय की गहराइयों से धन्यवाद और बधाइयाँ, आदरणीय.
बहुत सुन्दर और सुगढ प्रयास हुआ है.
सादर

इनसे नाता जोड़

इनसे नाता जोड़

परिचय करते वक्त ही,  पहले पूछे नाम
परिचय सुद्रड़ हो तभी, करे बात की काम॥ 
परिचय देवे पेड़ का, बच्चे को बतलाय,
इनके क्या क्या नाम है,अच्छे से समझाय 

कन्द मूल खाकर रहे, वन में सीता राम,
चौदह वर्षों तक किया, पेड़ तले विश्राम ||

वृक्षों में मै पीपल हूँ, कृष्ण स्वयं बतलाय
वृक्षों में भी प्राण है, इसको वह समझाय || 

वटवृक्ष  तले बैठकर, लिया बुद्ध ने ज्ञान,
पेड़ पौध सब सांस ले, गौत्तम दे संज्ञान       

प्रभु कृपा से पेड़ मिले, ईसा का सन्देश,
रब दी छाया पेड़ से, नानक का उपदेश ||

कोंपल कुचले ना कभी, टहनी को मत तोड़,
तन-मन ताजा रह सके, इनसे नाता जोड़ ||

- लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

पांच दोहे - लक्ष्मण लडीवाला

पांच दोहे - लक्ष्मण लडीवाला


एकाकीपन साँझ का, मन विचलित करजाय 
इस पड़ाव पर उम्र के , बनता कौन सहाय |

सुन्दर हर पल वह घडी,अनुपम सा उपहार
साँस साँस की हर लड़ी,करती जैसे प्यार |

होठ छुअन अहसास ही, मुग्ध मुझे करजाय,
संयम त्यागा स्वपन में, चंचल मन भटकाय |

बहका बहका दिख रहा, खुद का ही व्यवहार
जैसे सब कुछ ख़त्म है, मन मेरा लाचार | 

मेरे जीवन में बसे, रूप  धरा  श्रृंगार,
पोर पोर में बह रही, बनी सतत रसधार |

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

बिन माटी सब शून्य

बिन माटी सब शून्य

धरती तो आधार है, जा न सके उस पार
जन्म,मरण अरु परण का,धरती ही आधार|

पञ्च तत्व से जन्म ले,पाय धरा की गोद 
हरेभरे उपवन खिले, प्राणी करे प्रमोद |

धरती गगन जहां मिले,लगे नीर की झील
हिरन दौड़ते खोजने, निकले मीलो मील |

हीरे मोती कुछ नहीं, जितनी धरा अमूल्य,
सभी मिले भूगर्भ में, बिन माटी सब शून्य|

निर्धन या धनवान हो, दो गज मिले जमीन,
साँसों की डोरी थमे, जाय  संपदा  हीन |

 -लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

मन में भरे मिठास

मन में भरे मिठास

धन की खटिया छोड़ दे, मोह नहीं रख पास
तन मन चंगा रख सके, मन में भरे मिठास |

समय मौत ग्राहक कभी, आ टपके अनजान
इन्तजार करना नहीं, इनकी फिदरत जान |
  
मात पिता स्व यौवन का,सदा करे सम्मान, 
जाने पर फिर ना मिले,सहजे रखकर ध्यान | 

छोडो चिंता अतीत की, चिंतन में हो आज,
समय व्यर्थ गँवाय नहीं, झट निपटावे काज |

उत्तम संग संगीत का, संत संग हो बात,
दोस्त बने सह्रदय के, दुनिया को दे मात |

विद्या श्रम अरु प्रभु में, सतत रहे संग्लन
उन्नति का ये मार्ग है, करे हमेशा यत्न |

इनको कम ना आंकिये, रोग शत्रु अरु कर्ज
वश में इनको रख सदा, काम क्रोध का मर्ज |

लोभ क्रोध अरु बदचलन, कर देते कमजोर,
आत्मबल कमजोर करे, मन में बैठे चोर |
(मौलिक व् अप्रकाशित)
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाल