Thursday, August 29, 2013

पांच दोहे - लक्ष्मण लडीवाला

पांच दोहे - लक्ष्मण लडीवाला


एकाकीपन साँझ का, मन विचलित करजाय 
इस पड़ाव पर उम्र के , बनता कौन सहाय |

सुन्दर हर पल वह घडी,अनुपम सा उपहार
साँस साँस की हर लड़ी,करती जैसे प्यार |

होठ छुअन अहसास ही, मुग्ध मुझे करजाय,
संयम त्यागा स्वपन में, चंचल मन भटकाय |

बहका बहका दिख रहा, खुद का ही व्यवहार
जैसे सब कुछ ख़त्म है, मन मेरा लाचार | 

मेरे जीवन में बसे, रूप  धरा  श्रृंगार,
पोर पोर में बह रही, बनी सतत रसधार |

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

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