Wednesday, March 6, 2013


जागरूक कर जाय  
लूट व् भ्रष्टाचार से, भरा पड़ा अखबार,
ह्त्या, बलात्कार की, ख़बरे है भरमार ।
घोटालों भरमार है, जनता को सब भान
जाँच करा बसते भरे,ये सरकार की शान ।

सुर्खियों में रहना ही, नेता समझे शान,
चर्चा में हरदम रहे,  नेता उसको जान  । 

खबर गर मजेदार है ,सच की क्या दरकार
संस्कृति व साहित्य से, नहीं अब सरोकार ।

जनहित सोंच खबर छपे, इसकी ही दरकार,   
जनजन को चेतन करे,वह असली अखबार ।

जनता में जागृति भरे, खबर सजग करजाय, 
जनसत्ता को सजग करे, चौथा स्तम्भ बताय ।
जनहित में खबरे छपे, इसकी ही दरकार,   
जनजन को चेतन करे,वह असली अखबार ।

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला  

Tuesday, March 5, 2013

तृष्णा हर ले साकी




मुग्ध हुआ देख तेरे चितवन नयनों का प्याला,
मेरे नयनों में लेलु थोड़ी,तेरी मुग्ध मधु हाला |

मन आतुर है देख तेरे अधरों की यह मुग्ध हाला 
थोडा जाम पिला तेरे कर से,मेरी ये ही मधुशाला |
मुग्ध हुआ में तो पढ़ तेरी कविता की पंक्ति-माला
मधु भरे शब्द तेरे, छलक रहा जैसे मधु प्याला |
कविता में गर हो मिठास,जैसे बैठे हो मधुशाला
छलक रहा यौवन जैसे,तृप्त करे ये अमृत-प्याला |
शेष पिला अब साकी,आतुर जिनकी अंतर ज्वाला 
तृष्णा उनकी हर पहले तू, जो जाते हो मधुशाला |
शीतल मधुमास भरी लगती,तेरे नयनों की ज्वाला,
इन्द्रजीत भी मुग्ध हुए है, पीकर तेरा अमृत प्याला ।
मत कहना दुनियावालों, मुझको कोई नेता का साला,
गम भूलने को लेऊ मै तो,छलकता नयनों का प्याला ।

 -लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर