कुंडलियाँ छंद
देते है आशीष वे, सर पर रखते हाथ,
मन में श्रद्धा भाव हो,रहते हरदम साथ |
रहते हरदम साथ, सभी है उनकी माया
समझों वे है साथ, मिले उनकी ही छाया
मिले सभी संस्कार संज्ञान में जो लेते
माने हम उपकार ख़ुशी ही पूर्वज देते ||
(2)
देवर हो लक्ष्मण तभी, दे वर सीता माथ
माँ का हो आशीष तो मिले जगत का साथ
मिले जगत का साथ, साथ में प्रभु की छाया
भ्राता से हो प्यार सुखो का घर में साया
घर का हो कल्याण भांजे न कोई तेवर
पाकर सुन्दर सीख बने जो काबिल देवर ||
(3)
घर घर तनाव बढ़ रहा, यही क्लेश का राज,
घर में सब भाई रहे, आपस में नाराज |
आपस में नाराज, तोड दे रिश्ता नाता
दोस्त से करे स्नेह, बंधू न आँख सुहाता |
बोले जिसका खून, संकट देख हो तत्पर
स्वर्ग बने वह देश, बसे प्रेम वहां घर घर ||
(4)
पत्नी लागी दाँव पर, गए युधिष्ठिर हार,
महासमर के वार का, धर्म बना आधार |
धर्म बना आधार, द्रोपदी चीर हरण का,
कृष्ण बने मझधार, तन पर बढ़ते चीर का
मढ़े दुशासन दोष, देखे न खुद की करनी,
क्यों होता मदहोश,लगा न दाँव पर पत्नी|
(5)
गहरा संकट चल रहा, अन्धो का है राज,
भीष्म भी खामोश हुए,बने कौन सरताज
बने कौन सरताज, रही ना कुछ मर्यादा,
सोच यही अब आज,रही न लाज अब ज्यादा
हो जो भी शिकार, वही ढाँपती चेहरा,
नारी करे पुकार, धर्म संकट है गहरा |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला