कुंडलिया छंद
(1)
(सन्दर्भ -वह समाचार कि एक बेटा एयर पोर्ट पर माँ को अकेला
छोड़ कर विदेश चला गया,माँ को बेघर कर गया )
माँ चल अब विदेश चले, बोला आकर पूत,
इस घर को अब बेच दे,बसे न कोई भूत ।
बसे न कोई भूत, न काम यहाँ घर आवे
चलना साथ विदेश, तन्हा न तू रह पावे ।
कुछ जांच है विशेष, अफसर बुलाते मुझको ,
करते यूँ इन्तजार, छोड़ भागा वह माँ को ।
(2)
राह जोहती पोर्ट पर, आँखों में था प्यार ,
पूत न आया लौट कर, बेच दिया घरबार
बेच दिया घरबार, उसे था धोखा देना .
माँ दे आशीर्वाद, बेटा सदा खुश रहना |
यहाँ और भी पूत, भरे क्यों दुख में आहे,
करे न चर्चा आप, दिखाती माँ ही राहे |
(3)
न्यायिक निर्णय देख ले,लड़ा नहीं अब चोंच |
लड़ा नहीं अब चोंच, नजीर बनी अब फांसी
नारी को कमजोर, समझ न करावे हांसी |
छोडो अब व्यभिचार, रख सद्भाव बन निर्भय
पलभर में अनुकूल, बने यूँ प्रतिकूल समय ||
(4)
नारी का अपमान हो,सारे व्यर्थ विधान
मूक बने शासक जहाँ, बढे वही हैवान |
बढे वही हैवान, नहीं रहती मर्यादा
नारी क्यों बेजान, प्रश्न है सीधा सादा |
रखना अपना ध्यान, छोड़ दे अब लाचारी
लेकर दुर्गा रूप, करे परिवर्तन नारी ||
(5)
पुरखे देते सीख है,रच जाते इतिहास,
वर्षों उस परिवार में, झरती रहे मिठास |
झरती रहे मिठास, सभी मिलजुल कर रहते
रहते सब खुशहाल, संग सुख दुख सब सहते
सबके मन सद्भाव, रहे क्यों मन से रूखे
वर्षों उस परिवार में, झरती रहे मिठास |
झरती रहे मिठास, सभी मिलजुल कर रहते
रहते सब खुशहाल, संग सुख दुख सब सहते
सबके मन सद्भाव, रहे क्यों मन से रूखे
परम्परा का भान, करा जाते यदि पुरखे ||
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
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