Saturday, October 19, 2013

कुंडलिया छंद 

(1)
(सन्दर्भ -वह समाचार कि एक बेटा एयर पोर्ट पर माँ को अकेला 
 छोड़ कर विदेश चला गया,माँ को बेघर कर गया )

माँ चल अब विदेश चले, बोला आकर पूत,
इस घर को अब बेच दे,बसे न कोई भूत । 
बसे न कोई भूत,  न काम यहाँ घर आवे
चलना साथ विदेश, तन्हा न तू रह पावे ।
कुछ जांच है विशेष, अफसर बुलाते मुझको ,
करते यूँ  इन्तजार,  छोड़ भागा वह माँ को  । 
(2)
राह जोहती पोर्ट पर, आँखों में था प्यार ,
पूत न आया लौट कर, बेच दिया घरबार   
बेच दिया घरबार, उसे  था धोखा देना         .
माँ दे आशीर्वाद,  बेटा सदा  खुश रहना  |
यहाँ और भी पूत, भरे क्यों दुख में आहे
करे न चर्चा आप, दिखाती माँ ही  राहे  |
(3)      
समय बड़ा बलवान है, दुष्कर्मी अब सोच,
न्यायिक निर्णय देख ले,लड़ा नहीं अब चोंच |
लड़ा नहीं अब चोंच, नजीर बनी अब फांसी
नारी को कमजोर, समझ न करावे हांसी |
छोडो अब व्यभिचार, रख सद्भाव बन निर्भय
पलभर में अनुकूल, बने यूँ प्रतिकूल समय ||
(4)
नारी का अपमान हो,सारे व्यर्थ विधान 
मूक बने शासक जहाँ, बढे वही हैवान |
बढे वही हैवान, नहीं रहती मर्यादा 
नारी क्यों बेजान, प्रश्न है सीधा सादा | 
रखना अपना ध्यान, छोड़ दे अब लाचारी 
लेकर दुर्गा रूप, करे परिवर्तन नारी ||

(5)
पुरखे देते सीख है,रच जाते इतिहास,
वर्षों उस परिवार में, झरती रहे मिठास |
झरती रहे मिठास, सभी मिलजुल कर रहते 
रहते सब खुशहाल, संग सुख दुख सब सहते 
सबके मन सद्भाव, रहे क्यों मन से रूखे 
परम्परा का भान, करा जाते यदि पुरखे || 

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला

No comments:

Post a Comment