कुंडलिया छंद
पाखंडी पाखण्ड का, रखे न कोई लेख
सट्टे के बाजार में, लेखा जोखा देख ।
लेखा जोखा देख, खोगए कितने सपने
कौन बने सरताज,बचे है कितने अपने
होते क्यों गुमराह, देख पलड़े की डंडी
चांदी काटे नित्य, हरबार ये पाखंडी ।
(२)
लूट रहे हो नित्य ही,मानो वे पाखण्ड
पहन मुखोटा घूमते, रहे न मान अखंड ।
रहे न मान अखंड, सभी को छलते रहते
रह मौके की ताक, मिले जो लेते रहते
नहीं धर्म ईमान, सद्भाव में ठूठ रहे
इनकी कर पहचान,जो देश को लूट रहे |
(3)
मधुशाला खुलती गयी, विद्यालय के पास,
आजादी जब से मिली, ऐसा हुआ विकास |
ऐसा हुआ विकास, मिले शराब के ठेके
आय करे सरकार, नेता रोटियाँ सेकें
शिक्षा पर हो ध्यान, उन्नत हो पाठशाला
शिक्षालय के पास, हो न कोई मधुशाला |
(4)
रंगत बदले मनुज अब, गिरगिट भी शर्माय
गिरगिट पुनर्जन्म धरे, नेता बनकर आय |
नेता बनकर आय, क्षमता और बढ़ जावे
पेटू बनकर खाय, खाकर डकार न लावे
ईश्वर करे सहाय, पाये न इनकी संगत,
सूझे न कछु उपाय,बदलते झट से रंगत |
.(5)
लोहा ले तलवार से, तभी कलम की शान
जनता करती याद है, बढे कलम का मान |
बढे कलम का मान, जुल्म पर खुलकर बोले
मसी छोड़ दे छाप, न्यायिक तुला पर तोले
रही धर्म के साथ, उसी ने मन को मोहा
काँपे कभी न हाथ, झूठ से जब ले लोहा||
(6)
संसद में प्रस्ताव को पारित करना शेष
दागी साथी बच सके, लाये अध्यादेश |
लाये अध्यादेश, वह राष्ट्रपति लौटाए
पाने जन विश्वास, स्वयं ही व्यर्थ बताए
जनता को सब थाह, रच रहे नेता मकसद
जनता की है चाह जावे न बागी संसद |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
पाखंडी पाखण्ड का, रखे न कोई लेख
सट्टे के बाजार में, लेखा जोखा देख ।
लेखा जोखा देख, खोगए कितने सपने
कौन बने सरताज,बचे है कितने अपने
होते क्यों गुमराह, देख पलड़े की डंडी
चांदी काटे नित्य, हरबार ये पाखंडी ।
(२)
लूट रहे हो नित्य ही,मानो वे पाखण्ड
पहन मुखोटा घूमते, रहे न मान अखंड ।
रहे न मान अखंड, सभी को छलते रहते
रह मौके की ताक, मिले जो लेते रहते
नहीं धर्म ईमान, सद्भाव में ठूठ रहे
इनकी कर पहचान,जो देश को लूट रहे |
(3)
मधुशाला खुलती गयी, विद्यालय के पास,
आजादी जब से मिली, ऐसा हुआ विकास |
ऐसा हुआ विकास, मिले शराब के ठेके
आय करे सरकार, नेता रोटियाँ सेकें
शिक्षा पर हो ध्यान, उन्नत हो पाठशाला
शिक्षालय के पास, हो न कोई मधुशाला |
(4)
रंगत बदले मनुज अब, गिरगिट भी शर्माय
गिरगिट पुनर्जन्म धरे, नेता बनकर आय |
नेता बनकर आय, क्षमता और बढ़ जावे
पेटू बनकर खाय, खाकर डकार न लावे
ईश्वर करे सहाय, पाये न इनकी संगत,
सूझे न कछु उपाय,बदलते झट से रंगत |
.(5)
लोहा ले तलवार से, तभी कलम की शान
जनता करती याद है, बढे कलम का मान |
बढे कलम का मान, जुल्म पर खुलकर बोले
मसी छोड़ दे छाप, न्यायिक तुला पर तोले
रही धर्म के साथ, उसी ने मन को मोहा
काँपे कभी न हाथ, झूठ से जब ले लोहा||
(6)
संसद में प्रस्ताव को पारित करना शेष
दागी साथी बच सके, लाये अध्यादेश |
लाये अध्यादेश, वह राष्ट्रपति लौटाए
पाने जन विश्वास, स्वयं ही व्यर्थ बताए
जनता को सब थाह, रच रहे नेता मकसद
जनता की है चाह जावे न बागी संसद |
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला
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