तृष्णा हर ले साकी
मुग्ध हुआ देख तेरे चितवन नयनों का प्याला,
मेरे नयनों में लेलु थोड़ी,तेरी मुग्ध मधु हाला |
मन आतुर है देख तेरे अधरों की यह मुग्ध हाला
थोडा जाम पिला तेरे कर से,मेरी ये ही मधुशाला |
मुग्ध हुआ में तो पढ़ तेरी कविता की पंक्ति-माला
मधु भरे शब्द तेरे, छलक रहा जैसे मधु प्याला |
कविता में गर हो मिठास,जैसे बैठे हो मधुशाला
छलक रहा यौवन जैसे,तृप्त करे ये अमृत-प्याला |
शेष पिला अब साकी,आतुर जिनकी अंतर ज्वाला
तृष्णा उनकी हर पहले तू, जो जाते हो मधुशाला |
शीतल मधुमास भरी लगती,तेरे नयनों की ज्वाला,
इन्द्रजीत भी मुग्ध हुए है, पीकर तेरा अमृत प्याला ।
मत कहना दुनियावालों, मुझको कोई नेता का साला,
गम भूलने को लेऊ मै तो,छलकता नयनों का प्याला ।
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर
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