Thursday, August 29, 2013

उसी राह पर दौड़

मानव दौड़ें राह पर, थकते उसके पाँव
आत्मा नापे दूरियाँ, नगर डगर हर गाँव |

थक जाते है पाँव जब, फूले उसकी साँस,
मन तो अविरल दौड़ता,मन में हो विश्वास |

सार्थक मन की दौड़ है, भौतिकता को छोड़
सही राह को जान ले, उसी राह पर दौड़ |

पञ्च तत्व से तन बना, जिसका होता अंत
बसते मन में प्राण है, जिसकी दौड़ अनंत |
भौतिकता को छोड़ कर, अंतर्मन की मान,
दिल गवाह जो भी करे, उस पर देना ध्यान
-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला 
जयपुर दि. २९-५-२०१३ 



सदस्य टीम प्रबंधनComment by Saurabh Pandey on June 1, 2013 at 9:28am



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इन सार्थक और सोद्येश्य दोहों के लिए हृदय की गहराइयों से धन्यवाद और बधाइयाँ, आदरणीय.
बहुत सुन्दर और सुगढ प्रयास हुआ है.
सादर

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